*आत्महत्या कोई समाधान नहीं, संवाद और सही मार्गदर्शन से बचाई जा सकती है जान: डॉ. हरि नाथ यादव*
(श्री कृष्णा न्यूरो मानसिक चिकित्सालय, नई गंज में विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर जागरूकता संगोष्ठी संपन्न)
जौनपुर।
नई गंज स्थित श्री कृष्णा न्यूरो मानसिक चिकित्सालय पर 'विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस' के अवसर पर एक विशेष जागरूकता संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी को संबोधित करते हुए चिकित्सालय के डायरेक्टर एवं वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. हरि नाथ यादव (MBBS, MD - Neuro-Psychiatrist) ने बताया कि यह दिवस हर साल मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने और समाज में बढ़ रहे आत्महत्या के मामलों को रोकने के उद्देश्य से मनाया जाता है। इस दौरान उन्होंने आत्महत्या के कारणों और रोकथाम के उपायों पर मरीजों, उनके परिजनों और समाज के लोगों को विस्तार से जागरूक किया।
वैश्विक आंकड़ों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. यादव ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में हर साल लगभग 7,27,000 लोग आत्महत्या करते हैं। इसका सीधा और भयावह अर्थ यह है कि वैश्विक स्तर पर हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति अपनी जान ले रहा है, यानी प्रतिदिन लगभग 2,000 आत्महत्याएं हो रही हैं।
भारत की स्थिति को और भी चिंताजनक बताते हुए उन्होंने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) 2024 की रिपोर्ट का हवाला दिया। डॉ. यादव ने बताया कि भारत में कुल 1,70,746 आत्महत्याएं दर्ज की गईं, जिसका मतलब है कि देश में हर दिन लगभग 468 लोग अपनी जान दे रहे हैं। वैश्विक स्तर पर होने वाली कुल आत्महत्याओं में दुनिया भर की महिलाओं में लगभग 37% और पुरुषों में 24% भारतीय होते हैं। व्यवसायों के आधार पर देखें तो कुल आत्महत्याओं में दिहाड़ी मजदूरों (31.0%) की संख्या सबसे अधिक है, जिसके बाद किसान और अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले लोग आते हैं।
डॉ. यादव ने विशेष रूप से बच्चों और छात्रों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की। एनसीआरबी 2024 के आंकड़ों के अनुसार, देश में 14,488 छात्रों ने अपनी जान दी है। उन्होंने बताया कि पिछले 5 वर्षों में नीट (NEET) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लगभग 93 बच्चों ने पढ़ाई के दबाव के कारण आत्महत्या की है, जिनमें से 30 से अधिक मामले केवल इसी वर्ष के हैं।
आत्महत्या के कारणों और लक्षणों (Warning signs) पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि बच्चों व युवाओं में असफलता का डर, माता-पिता की अत्यधिक उम्मीदें, साथियों का दबाव (Peer Pressure) और पढ़ाई का तनाव मुख्य कारण हैं। वहीं, बड़ों में पारिवारिक समस्याएं (33.5%), बीमारी (18.0%), और नशा/ड्रग्स की लत (7.6%) प्रमुख कारण हैं। उन्होंने बताया कि यदि कोई बच्चा या बड़ा अचानक गुमसुम हो जाए, पसंदीदा चीजों से दूरी बना ले, उसकी भूख या नींद में बदलाव आए या वह हमेशा निराशाजनक बातें करे, तो यह खतरे का एक बड़ा संकेत हो सकता है।
बचाव के उपायों पर बात करते हुए डॉ. यादव ने एम्पैथेटिक लिसनिंग' (सहानुभूतिपूर्ण श्रवण) को सबसे महत्वपूर्ण बताया।सहानुभूतिपूर्ण श्रवण वह अभ्यास है जिसमें दूसरे व्यक्ति की भावनाओं पर ध्यान दिया जाता है और बिना किसी पूर्वाग्रह के उनके दृष्टिकोण को समझने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने युवाओं को प्रेरित (Motivate) करते हुए कहा कि कोई भी परीक्षा या असफलता जीवन का अंतिम पड़ाव नहीं होती। यह जिंदगी का केवल एक हिस्सा है। एक रास्ता बंद होने पर जीवन में नई शुरुआत की जा सकती है, क्योंकि जिंदगी में आगे बहुत सी नई चीजें और बेहतरीन अवसर आते हैं। असफलता से जिंदगी खत्म नहीं होती।
अभिभावकों को खास सुझाव (Tips) देते हुए डॉ. यादव ने अपील की कि वे बच्चों पर पढ़ाई का अत्यधिक दबाव न बनाएं। बच्चों को नशे और मोबाइल की लत से दूर रखें, उनके खान-पान का ध्यान रखें और घर का माहौल सकारात्मक व सुरक्षित बनाएं। यदि किसी व्यक्ति या बच्चे में अवसाद के लक्षण दिखें, तो बिना देरी किए तुरंत एक न्यूरो-साइकिएट्रिस्ट से संपर्क करना चाहिए। सही समय पर दवाइयों और उचित चिकित्सा पद्धति से मानसिक अवसाद को पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है।
इस अवसर पर डॉ. हरि नाथ यादव के साथ क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रतिमा यादव, डॉ. सुशील यादव, अस्पताल का समस्त स्टाफ, तथा वहां आए हुए मरीज एवं उनके परिजन उपस्थित रहे। अंत में, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रतिमा यादव ने सभी उपस्थित लोगों को मानसिक अवसाद के मनोवैज्ञानिक पहलुओं के बारे में विस्तार से समझाया। उन्होंने सभी का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए यह संदेश दिया कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में मौजूद कलंक (Stigma) को हमें मिलकर मिटाना होगा, तभी हम एक स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकेंगे।
